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पहले 10 शब्द जो आपको इस्लामी वित्त में समझने चाहिए

इस्लामी वित्त में डूबने से पहले, इन 10 मूल शब्दों को जानना जरूरी है। ये शरिया-अनुपालक लेन-देन की नींव हैं।

रिबा (ब्याज) - इस्लामी वित्त का मुख्य निषेध

रिबा का अर्थ है ब्याज या सूद, जो इस्लाम में सख्त वर्जित है। इसे अन्यायपूर्ण लाभ माना जाता है। 'क़िस्त' (Qist) प्लेटफॉर्म पर सभी लेन-देन रिबा-मुक्त हैं: कोई ब्याज नहीं, कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं। भुगतान USDC में होता है, और कोई भी अतिरिक्त राशि वापस कर दी जाती है।

ग़रर (अनिश्चितता) - जोखिम से बचाव

ग़रर का अर्थ है अत्यधिक अनिश्चितता या धोखाधड़ी, जो इस्लामी वित्त में निषिद्ध है। 'क़िस्त' के स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट पूरी तरह से पारदर्शी और ऑडिटेड हैं, जिससे सभी शर्तें स्पष्ट होती हैं। कोई छिपी हुई फीस या अस्पष्ट शर्तें नहीं।

मुदारबा (लाभ-साझेदारी) - निवेश का इस्लामी तरीका

मुदारबा एक तरह की साझेदारी है जहां एक पक्ष पूंजी प्रदान करता है और दूसरा श्रम। लाभ पूर्व-निर्धारित अनुपात में बांटा जाता है, जबकि नुकसान पूंजी प्रदाता वहन करता है। 'क़िस्त' पर मुदारबा-आधारित उत्पाद उपलब्ध होंगे।

मुराबहा (लागत-प्लस बिक्री) - वित्तपोषण का सामान्य तरीका

मुराबहा में विक्रेता खरीद मूल्य और लाभ मार्जिन का खुलासा करता है। 'क़िस्त' पर, विक्रेता (बेचने वाला) परिसंपत्ति का मालिक होता है, और खरीदार USDC में किश्तों में भुगतान करता है। अतिरिक्त राशि वापस कर दी जाती है।

कैसे 'क़िस्त' इसे लागू करता है

'क़िस्त' पर, प्रत्येक लेन-देन शरिया-अनुपालक है: ब्याज-मुक्त, पारदर्शी, और परिसंपत्ति-समर्थित। स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट में 3 दिन की छूट अवधि और 2% शुल्क शामिल है। सभी कोड BaseScan पर सत्यापित हैं, जो पूर्ण विश्वास सुनिश्चित करते हैं।

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यह सामग्री केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है, वित्तीय सलाह नहीं।